हाशिए पर जा चुके लोग लाशों पर कर रहे राजनीति

चर्चा में बने रहने के लिए इनको परंपरा और देश के सम्मान की भी फिक्र नहीं

गिरीश पाण्डेय

उत्तर प्रदेश देश की सर्वाधिक आबादी वाला प्रदेश है। इसीके अनुसार इसकी चुनौतियां भी अधिक हैं। बावजूद इसके वैश्विक महामारी कोरोना की दूसरे दौर की इस अप्रत्याशित और अभूतपूर्व चुनौती का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में सफलता पूर्वक मुकाबला किया जा रहा है। हर किसी की जिंदगी को अनमोल और हर किसी की जीविका को जरूरी मानते हुए प्रदेश सरकार ने सूबे की 24 करोड़ से अधिक जनता को कोरोना के संक्रमण से बचाने में अपनी पूरी ताकत और संसाधन झोंक दिए हैं।

संक्रमण से प्रदेश के 90 हजार से अधिक गांव और 65 फीसद से अधिक आबादी सुरक्षित रहे इस बाबत 60 हजार से अधिक निगरानी समिति के लोग गांवों में लोगों को कोरोना के संक्रमण से बचने के उपायों के प्रति जागरूक कर रहे है। शहरों में काफी हद तक कोरोना पर नियंत्रण के बाद ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट के सफल फार्मूले के केंद्र में अब गांव हैं। रोज हो रही करीब 2.5 लाख जांचों में से करीब एक लाख गांवों में हो रही हैं। मुख्यमंत्री इनको लगातार बढ़ाने का निर्देश दे रहे हैं। जिसे भी लक्षण हैं उनको तुरंत निशुल्क दवाओं की किट दी जा रही है।

नतीजतन कोरोना के हर फ्रंट से करीब दो हफ्ते से अच्छी खबरें आ रही हैं। कोविड के एक्टिव केस की संख्या 24 अप्रैल के पीक से आधे से अधिक घटी है। संक्रमित होने वालों की तुलना में ठीक होने वाले लगातार बढ़ रहे हैं। इसी अनुसार एक्टिव केस भी कम हुए हैं और रिकवरी रेट देश के औसत से ऊपर ( 91% फीसद से अधिक) है। सीएम योगी की अगुआई में जारी कोविड प्रबंधन की देश दुनिया (विश्व स्वास्थ्य संगठन, नीति आयोग, मुंबई हाइकोर्ट) में तारीफ हो रही है।

ऐसे में जनता द्वारा लगातार ठुकराए गए लोग चर्चा में बने रहने के लिए बेवजह की राजनीति कर रहे हैं। हाशिए पर पहुंच गए आधारहीन लोग अब लाशों पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं। उनके इस कुत्सित प्रयास से दुनिया भर में देश की जो छवि खराब हो रही है उसकी भी इनको तनिक भी फिक्र नहीं। दरअसल, ये वही लोग हैं जिनको अपने हित के आगे कभी भी देश, प्रदेश और समाज की चिंता रही भी नहीं है। इसी नाते जनता इनको बार-बार दुत्कार भी चुकी है।

ताजा प्रकरण गंगा समेत कुछ और नदियों में पिछले दिनों मिले शवों का है। इस मुद्दे को तिल का ताड़ बनाने वालों को शायद उन लोगों की परंपरा का पता नहीं जिनके वहा शवों को दफनाने की ही परंपरा है। कुछ जगहों पर सुविधानुसार जलाने का भी विकल्प है।
इलाहाबाद के दारागंज निवासी 60 वर्षीय किरन शर्मा बताते हैं कि इसमें नया कुछ भी नहीं है। मैं तो वर्षों से जब भी फाफामऊ पुल से होकर गुजरता हूं, गंगा की रेती में बालू के कुछ टीले और उनपर चमकते हुए कपड़े दिख जाते हैं। मैं ही क्यों, इनको कोई भी देख सकता है। महामारी के नाते यह संख्या कुछ अधिक होना स्वाभाविक है, पर दफनाए गए सारे शव महामारी से मरने वालों के हैं, यह कहना सरासर गलत होगा।

खरी-खरी बोलने वाले किरन के मुताबिक फाफामऊ इलाके में समाज के कुछ वर्गो में शवों को दफनाने की यह परंपरा (रीति) आज भी है। यह लोग परंपरा के अनुसार अपने परिजनों के शव को गंगा स्नान कराने से लेकर सारी रस्म करते हैं। यह सब करने के बाद उसे वहीं दफन कर देते हैं। करीब डेढ़ दशक पहले तक गोस्वामी समाज के अधिकांश लोगों को दफन ही किया जाता था। समुदाय से ही विरोध होने के बाद शहरो और देहातों में अब भी क्रमशः 20 से 50% लोग नदी के किनारे दफन ही किए जाते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य अर्चक श्रीकांत मिश्र और अयोध्या के ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश तिवारी के अनुसार अपने शास्त्रों में पंचख के दौरान जो पांच काम वर्जित हैं उसमे पहला निषेध शवदाह का ही है। पंचख की स्थिति हर माह में एक बार आती है। इस दौरान भी अधिकांश लोग खासकर ग्रामीण इलाके में लोग अपने परिजनों के शवों को या तो पास की नदी में प्रवाहित करते हैं या नदी के किनारे दफन कर देते हैं।

जबसे नदियों के प्रदूषण को लेकर लोग जागरूक हुए हैं और शासन-प्रशासन इसे लेकर सख्त हुआ है तबसे शवों को प्रवाहित करने की प्रथा तो लगभग खत्म हो गई है, पर दफन करने की प्रथा अब भी कहीं कहीं जारी है। एसोसोसिटेड प्रेस (AP) के फोटो जर्नलिस्ट राजेश सिंह के मुताबिक मैंने तो इस तरह के कई फोटो शूट किए हैं और लोगों के बयान भी रिकॉर्ड किए हैं। इनमे लोगों ने साफ कहा है नदी के किनारे शवों को दफन करना हमारी परंपरा में है।

गिरीश पाण्डेय

यह पहला मौका नहीं है जब गंगा में दफन किए गए शव मिले हों। समय समय पर ऐसी घटनाओं का देशी और विदेशी मीडिया संज्ञान भी लेती रही है। मसलन 14 जनवरी 2015 को एनडीटीवी ने एक ऐसी ही रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें गंगा में 100 से अधिक तैरते शवों का जिक्र था। 19 जनवरी 2016 को रायटर में छपी एक खबर में भी ऐसे ही 80 शवों का जिक्र था। इन घटनाओं को तबके स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों ने गंगा की सफाई से जोड़ते हुए प्रमुखता से छापा था। हर रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि कुछ स्थानीय लोगों में अपने मृत परिजनों को दफनाने की परंपरा है।

हाल की रिपोर्ट में भी कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर इस सत्य को तथ्य के साथ उजागर किया है कि यूपी के प्रयागराज में गंगा किनारे शवों को दफनाने का मामला पूरी तरह से परंपरा से जुड़ा हुआ है। द वाशिंगटन पोस्ट डॉट कॉम, एससी नाउ डॉट कॉम, हाइलैंड न्यूज़-सन पर प्रकाशित और विश्व भर में प्रसारित इन रिपोर्ट्स में 15 मई को गंगा किनारे विस्तार से पड़ताल की गई है और शव दफन करने वालो से बात कर हकीकत से रूबरू कराया गया है।

कोरोना के इस कालखंड में देश की छवि को धूमिल कर अपनी राजनीति चमकाने वालों को सरकार और जनता की दलीलों के साथ इन देशी और विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के आईने में भी खुद को झांक लेना चाहिए। वैसे स्थानीय लोग सच्चाई से वाकिफ हैं और इसे स्वीकार भी करते हैं।

हालाकि शासन ने प्रमुख नदियों के किनारे शवों को दफन करने या प्रवाहित करने से रोकने के आदेश प्रशासन को दिए हैं। इसे रोकने के लिए नदियों में गश्त बढ़ा दी गई है। लोगों को अंतिम संस्कार लिए सरकार एक तय रकम भी दे रही है, पर कुछ लोगों के ये सब नहीं दिखता। दर असल वह इसे देखना ही नहीं चाहते। यह उनके नजरिए का दोष है। ऐसा दोष जो लाइलाज है। अलबत्ता जनता समय समय पर उनको उनकी हैसियत बताती रहती है।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button