किसान आंदोलन पर चढ़ा सियासी रंग -मुद्​दे पीछे, राजनीति प्रभावी

लखनऊ : किसान आंदोलन अब पूरी तरह सियासी हो चुका है। इसके नाते किसानों के मुद्​दे पीछे छूट गये ओर राजनीति प्रभावी हो गई। इस पूरे आंदोलन में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने लगातार अपना स्टैंड बदला है। इसके नाते वह अपनों में ही अप्रासंगिक हो गए हैं। याद करिए टिकैत का वह बयान जो उन्होंने केंद्र द्वारा पारित बिल के बाद चार जून 2020 को दिया था। उस समय उन्होंने कहा था कि किसानों की वर्षों पुरानी मांग पूरी हुई। भाकियू लंबे समय से एक देश एक मंडी की मांग करती रही है। तब उन्होंने सरकार से यह आग्रह किया था कि वह इस बात पर भी नजर रखे कि कहीं किसान के बजाए बिचौलिये सक्रिय होकर उनकी फसल सस्ते दामों में खरीद कर दूसरे राज्यों में न बेचने लगे। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की थी कि वह एक और कानून लागू करे जिसमें देश में कहीं भी एमएसपी से कम दाम पर किसानों की उपज नहीं बिक सके।

इस बयान के संदर्भ में टिकैत के मौजूदा स्टैंड को देखें तो उनके बदलते रंग से गिरगिट भी शरमा जाए। कहने को तो भाकियू गैर राजनीतिक संगठन है। पर मौजूदा समय में पूरा का पूरा आंदोलन राजनेताओं ने हाईजैक कर लिया है। आप जैसी विशुद्ध शहरी पार्टी से लेकर उत्तरप्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन की तलाश कर रही कांग्रेस और 2014 से जनता से बार-बार खारिज की जा चुकी समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी भी अचानक किसानों की हमदर्द हो गई है। सबकी सहानुभूति टिकैत के साथ है। चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह और अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी तथा आप पार्टी के मनीष सिसौदिया भी राकेश टिकैत के आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखा रहे हैं। बगैर यह जाने कि उनके आंसू घडि़याली थे या असली उसे पोंछने की कोशिश कर रहे हैं।

यह वही लोग हैं जिन्होंने अपने समय में किसानों को सिर्फ वोट बैंक समझा। इनके लिए किसानों का हित सिर्फ नारों तक ही सीमित रहा। किसानों के हित में कुछ करने की बजाय उनको खुदकुशी के लिए मजबूर किया। इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों के हित को शुरू से लेकर अब तक सर्वोपरि रखा। अपनी पहली ही कैबिनेट में उन्होंने 86 लाख लघु-सीमांत किसानों के 36 हजार करोड़ रुपये के कर्जे माफ कर संकेत दे दिया कि उनके लिए किसानों का हित सिर्फ नारा नहीं संकल्प है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं और धान की पूरी पारदर्शिता से रिकार्ड खरीद। 72 घंटे में सीधे किसानों के खाते में भुगतान। इसी तरह गन्ने की रिकार्ड पेराई और भुगतान भी हुआ। वर्षों से अधूरी पड़ी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने की डेड लाइन तय करके सिंचन क्षमता में अभूतपूर्व विस्तार किया। बुंदेलखंड की सिंचाई परियोजनाओं को गति देने के अलावा सूखे के समय वहां के खेतों की प्यास बुझाने के लिए खेत-तालाब योजना शुरू की। यहां तक कि कोरोना के अभूतपूर्व संकट के दौरान भी मुख्यमंत्री योगी ने किसानों को फसल की कटाई, मड़ाई और विपणन के लिए हर संभव मदद मुहैया कराई।

टिकैत ने गवाई अपनों की भी सहानुभूति

यही वजह है कि आम किसान आज बेहद खुश है। कथित किसान आंदोलन से उसका कोई लेना देना नहीं है। दिल्ली में पिछले दिनों ट्रैक्टर रैली के दौरान लाल किले पर हुई हिंसा। तिरंगे के अपमान और गणतंत्र दिवस के परेड में शामिल होने गई अयोध्या में निर्माणाधीन भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर की झांकी को क्षतिग्रस्त कर आंदोलनकारियों ने रही-सही सहानुभूति को भी गवां दिया। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर पहले आंदोलनकारियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों ने कई जगह उनके तंबू-कनात उखाड़ कर घर वापस होने के लिए विवश कर दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक किसान रवींद्र त्यागी के अनुसार हम तो अपना नेता सिर्फ चरण सिंह को ही मानते हैं। बाकी तो सब बिकाऊं निकले। इनका कोई चरित्र नहीं है। थाली के बैगन की तरह जिधर ढलान मिली लुढ़क लिए।

गोरखपुर के प्रगतिशील किसान इंद्रप्रकाश सिंह का कहना है कि टिकैत जैसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। यह उनके और उनका समर्थन करने वालों के लिए मुस्कराने का अंतिम मौका हो सकता है। किसान बखूबी जानता है कि कौन उसका असली हितैषी है और कौन अपने राजनैतिक लाभ के लिए उसका यूज कर रहा है। सीतापुर के हिंडौरा गांव के किसान मनोज शुक्ला तो राकेश टिकैत को किसान नेता ही नहीं मानते। मनोज के अनुसार राकेश टिकैत तो पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के अमीर किसानों के नेता हैं। यही वजह है कि पश्चिमी यूपी को कुछ जिलों को छोड़कर यूपी के अन्य जिलों में किसानों के आन्दोलन को लेकर कोई समर्थन नहीं है। और विपक्षी दल भी इन किसानों को किसान आंदोलन से जोड़ने में सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि सूबे का किसान अब विपक्ष की राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहता है। जबकि उत्तर प्रदेश वह राज्य है जिसकी आबादी का 65 फ़ीसदी हिस्सा कृषि पर आश्रित है।

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